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Sacred Devotional Hymn

हनुमान चालीसा: संपूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ और लाभ

हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित पढ़ें और सुनें। पाठ विधि, शुभ मुहूर्त और लाभ जानें। तुलसीदास रचित यह चालीसा संकट दूर करने में सहायक मानी जाती है।

हनुमान चालीसा: संपूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ और लाभ - Vyas Astrology
प्रामाणिक पाठ
Verified by Pt. Jitendra Vyas

श्री हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में रचित 40 चौपाइयों का एक भक्ति ग्रंथ है, जो श्री हनुमान जी को समर्पित है। इसे नियमित पढ़ने से भय, नकारात्मकता और संकट दूर होते हैं तथा मन को शक्ति और शांति मिलती है। मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

हनुमान चालीसा पर पं. जितेन्द्र व्यास का अनुभव

हमारे परिवार में वैदिक कर्मकांड, ज्योतिष एवं श्रीहनुमान उपासना की परंपरा वर्ष 1955 से पूज्य पं. गोमती प्रसाद व्यास जी द्वारा प्रारंभ हुई। उसी गुरु-परंपरा का अनुसरण करते हुए मैं, पं. जितेन्द्र व्यास, वर्षों से श्रद्धालुओं को हनुमान चालीसा के सही उच्चारण और शास्त्रीय विधि का मार्गदर्शन दे रहा हूँ। मेरी दैनिक साधना में इसका स्थायी स्थान है — स्नान, दीप प्रज्वलन और पूर्ण एकाग्रता के साथ पाठ करता हूँ। मेरे अनुभव में पाठ की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण उसका भाव, शुद्ध उच्चारण और नियमितता है।

मेरे अनुभव से: कई श्रद्धालुओं ने नियमित हनुमान चालीसा पाठ अपनाने के बाद मानसिक तनाव में शांति, रुके हुए कार्यों में प्रगति और आत्मविश्वास में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किया है।

सबसे आम गलतियाँ: जल्दबाज़ी में पाठ करना, अशुद्ध उच्चारण, अर्थ समझे बिना केवल रटकर पढ़ना, और नियमितता की कमी।

"हनुमान चालीसा केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि आत्मबल, अनुशासन और भगवान श्रीहनुमान की कृपा प्राप्त करने का दिव्य माध्यम है।" — पं. जितेन्द्र व्यास

हनुमान चालीसा की उत्पत्ति

हनुमान चालीसा की रचना भक्तिकाल के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में की थी। मान्यता है कि हनुमान जी बाल्यावस्था में सूर्य को फल समझकर निगल गए थे, जिससे क्रोधित होकर इंद्र देव ने उन्हें मूर्छित कर दिया। बाद में जब देवताओं को पता चला कि हनुमान जी भगवान शिव के रुद्र अवतार हैं, तो सभी देवताओं ने उन्हें अपनी-अपनी शक्तियाँ प्रदान कर स्वस्थ किया। तुलसीदास जी ने इन्हीं शक्तियों और हनुमान जी के पराक्रम का वर्णन करते हुए इस चालीसा की रचना की।

हनुमान चालीसा - पूरा पाठ

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

शंकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन॥

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

हनुमान चालीसा दोहा - अर्थ सहित

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
श्री गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करके, मैं श्री रघुबर (राम जी) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) देने वाला है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अपने आप को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान जी का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान जी, मुझे बल, बुद्धि और ज्ञान दीजिए तथा मेरे सभी दुख और विकार दूर कीजिए।

हनुमान चालीसा चौपाई - अर्थ सहित

1.जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
हे ज्ञान और गुणों के सागर हनुमान जी, आपकी जय हो। हे वानरराज, तीनों लोकों में आपकी कीर्ति फैली हुई है।
2.राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
आप श्री राम के दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप अंजनी माता के पुत्र और पवनसुत के नाम से जाने जाते हैं।
3.महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
हे महावीर, आप वज्र के समान शरीर वाले पराक्रमी हैं। आप बुरी बुद्धि को दूर करने वाले और अच्छी बुद्धि के साथी हैं।
प्रातः-सायं 108 बार जाप से नकारात्मक विचारों से मुक्ति
4.कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा॥
आपका रंग स्वर्ण के समान है, सुंदर वस्त्र धारण किए हैं, कानों में कुण्डल और घुँघराले बाल हैं।
5.हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
आपके हाथों में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं, कंधे पर मूँज का जनेऊ धारण किए हैं।
6.शंकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन॥
आप भगवान शंकर के अंश और केसरी नंदन हैं। आपका तेज और प्रताप संपूर्ण जगत में वंदनीय है।
7.विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
आप विद्यावान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं, तथा सदैव श्री राम के कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं।
विद्या-बुद्धि वृद्धि हेतु प्रतिदिन 108 बार जाप
8.प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
आप प्रभु श्री राम के चरित्र सुनने के प्रेमी हैं। राम, लक्ष्मण और सीता जी सदा आपके मन में बसते हैं।
9.सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
आपने सूक्ष्म रूप धारण कर सीता माता को दर्शन दिए और विकराल रूप धारण कर लंका को जला दिया।
10.भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥
आपने विशाल रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया और श्री रामचंद्र जी के कार्य सफल किए।
शत्रु व बाधा पर विजय हेतु 108 बार जाप
11.लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
आप संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जीवित किया, जिससे श्री राम ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगाया।
12.रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
श्री रघुपति ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि आप मुझे भरत के समान ही प्रिय भाई हो।
13.सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
हजारों मुख आपका यश गाते हैं, ऐसा कहकर श्री राम ने आपको गले से लगाया।
14.सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
सनक आदि मुनि, ब्रह्मा जी, नारद जी, सरस्वती जी और शेषनाग भी आपका यश गाते हैं।
15.जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
यमराज, कुबेर, दिशाओं के रक्षक तथा बड़े-बड़े कवि व विद्वान भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।
16.तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
आपने सुग्रीव पर उपकार किया, उन्हें श्री राम से मिलाकर राजपद दिलवाया।
17.तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
आपकी सलाह मानकर विभीषण जी लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।
18.जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
हजारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया था।
19.प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
प्रभु राम की अंगूठी मुख में रखकर आपने समुद्र लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
20.दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
संसार के जितने भी कठिन कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।
कठिन कार्यों की सिद्धि के लिए
21.राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
आप श्री राम के द्वार के रखवाले हैं, आपकी आज्ञा के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
22.सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपकी शरण में आने वाले को सभी सुख मिलते हैं, आप रक्षक हों तो किसी का भय नहीं रहता।
23.आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
आप अपने तेज को स्वयं ही संभाल सकते हैं, आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप उठते हैं।
24.भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
जब आपका नाम लिया जाता है, तो भूत-पिशाच पास नहीं आते।
सुबह-शाम 108 बार जाप से भय से पूर्ण मुक्ति
25.नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
निरंतर हनुमान जी का जाप करने से सभी रोग और पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।
मंगलवार को 108 बार जाप से रोग-मुक्ति
26.संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे सभी संकटों से छुड़ाते हैं।
हर प्रकार के संकट से मुक्ति के लिए
27.सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
सबके ऊपर तपस्वी राजा श्री राम हैं, उनके सभी कार्य आपने सफल किए।
28.और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
जो कोई भी अपनी इच्छा लेकर आपके पास आता है, वह अपार जीवन-फल पाता है।
29.चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
चारों युगों में आपका प्रताप है और यह संसार में प्रसिद्ध एवं उजियारा फैलाने वाला है।
30.साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
आप साधु-संतों के रक्षक और राक्षसों का नाश करने वाले, श्री राम के परम प्रिय हैं।
31.अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
माता जानकी ने आपको आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने का वरदान दिया है।
सूर्योदय से पूर्व जाप से संकट-निवारण व समृद्धि
32.राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
आपके पास श्री राम-भक्ति रूपी रसायन है, और आप सदा श्री रघुपति के दास बने रहते हैं।
33.तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
आपका भजन करने से भक्त श्री राम को प्राप्त करता है और जन्म-जन्म के दुख भूल जाता है।
34.अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
अंतकाल में भक्त श्री राम के धाम को जाता है, जहाँ वह हरिभक्त कहलाता है।
35.और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
अन्य देवताओं का ध्यान न करते हुए भी, केवल हनुमान जी की सेवा से समस्त सुख प्राप्त होते हैं।
36.संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जो बलवीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सभी संकट कट जाते हैं और पीड़ा मिट जाती है।
37.जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
हे हनुमान स्वामी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। कृपया गुरुदेव की भांति मुझ पर कृपा कीजिए।
38.जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो कोई सौ बार इस चालीसा का पाठ करता है, वह बंधनों से मुक्त होकर महान सुख पाता है।
39.जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है, इसके साक्षी स्वयं भगवान शिव हैं।
40.तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि वे सदा भगवान के सेवक हैं। हे नाथ, आप मेरे हृदय में सदा निवास कीजिए।

हनुमान चालीसा समापन दोहा - अर्थ सहित

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हे पवनपुत्र, संकट हरने वाले, मंगल स्वरूप हनुमान जी, आप श्री राम, लक्ष्मण और सीता माता सहित मेरे हृदय में सदा निवास कीजिए।

हनुमान चालीसा संकट मोचन हनुमानाष्टक - पूरा पाठ

संकट मोचन हनुमानाष्टक हनुमान जी के 8 प्रसंगों का वर्णन करने वाला स्तोत्र है, जो गंभीर संकट, न्यायालय के मामलों और ग्रह-दोष में विशेष लाभकारी माना जाता है।

बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो। देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो। कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो। हेरी थके तट सिन्धु सबै तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसी सों कही सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो। चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो। लै गृह वैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु-बीर उपारो। आनि संजीवनी हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

रावण युद्ध अजान कियो तब, नाग की फांस सबै सिर डारो। श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो। आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

बन्धु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो। देवहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो। जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समैत संहारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

काज किये बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो। बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥

लाल देह लाली लसे, अरू धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय कपि सूर॥

हनुमान चालीसा संकट मोचन हनुमानाष्टक - अर्थ सहित

1.बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो। देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बचपन में आपने सूर्य को निगल लिया था, जिससे तीनों लोकों में अंधेरा छा गया और संसार में भय फैल गया। देवताओं ने विनती की, तब आपने सूर्य को छोड़ा। संसार में कौन नहीं जानता कि हे कपि, आपका नाम संकटमोचन है।
2.बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो। कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
सुग्रीव बालि के भय से पर्वत पर छिपे थे। मुनि के शाप से उलझन हुई, तब आपने ब्राह्मण रूप धारण कर सुग्रीव का शोक दूर किया।
3.अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो। हेरी थके तट सिन्धु सबै तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
सीता माता की खोज में सब समुद्र तट पर थक गए थे, तब आपने ही सीता माता की खबर लाकर सबके प्राण बचाए।
4.रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसी सों कही सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो। चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
जब रावण ने सीता माता को त्रास दिया, तब आपने राक्षसों को मारा और प्रभु राम की मुद्रिका देकर माता का शोक दूर किया।
5.बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो। लै गृह वैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु-बीर उपारो। आनि संजीवनी हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए, तब आप वैद्य सुषेन सहित द्रोण पर्वत उठा लाए और संजीवनी बूटी से उनके प्राण बचाए।
6.रावण युद्ध अजान कियो तब, नाग की फांस सबै सिर डारो। श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो। आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
रावण ने नागपाश छोड़ा और पूरी सेना मोहित हो गई, तब आप गरुड़ जी को लाए और बंधन काटकर संकट दूर किया।
7.बन्धु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो। देवहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो। जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समैत संहारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
जब अहिरावण श्री राम को पाताल ले गया, तब आपने ही जाकर सहायता की और अहिरावण को सेना सहित नष्ट किया।
8.काज किये बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो। बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
हे वीर महाप्रभु, आपने देवताओं के इतने बड़े कार्य किए हैं। हमारे इस संकट को दूर करना आपके लिए क्या कठिन है। शीघ्र हमारा संकट हर लीजिए।
लाल देह लाली लसे, अरू धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय कपि सूर॥
लाल शरीर पर लाली शोभा देती है, और लाल पूंछ धारण किए हुए हैं। वज्र के समान कठोर देह वाले, दानवों का दलन करने वाले वानरवीर की जय हो, जय हो।

हनुमान चालीसा श्री बजरंग बाण - पूरा पाठ

बजरंग बाण अत्यंत प्रभावशाली पाठ है, जो गंभीर संकट, भय, रोग और शत्रु बाधा में तुरंत राहत के लिए पढ़ा जाता है। इसे विशेष श्रद्धा और सावधानी के साथ पढ़ना चाहिए।

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी॥

जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर ह्वै दुःख करहु निपाता॥

जै गिरिधर जै जै सुख सागर। सुर-समूह-समरथ भटनागर॥

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥

ॐ कार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥

सत्य होहु हरि शपथ पायके। राम दूत धरु मारु जाय के॥

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥

वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥

पांय परौं कर जोरि मनावौं। येहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥

जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता॥

बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

भूत, प्रेत, पिशाच निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर॥

इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की। राखउ नाथ मरजाद नाम की॥

जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ बिलंब न लावो॥

जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुःख नाशा॥

चरण शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पाँय परौं, कर जोरि मनाई॥

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥

अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनंद हमरो॥

यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिरि कौन उबारै॥

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥

यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब कापैं॥

धूप देय जो जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥

प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

हनुमान चालीसा श्री बजरंग बाण - अर्थ सहित

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
जो व्यक्ति निश्चय, प्रेम और श्रद्धा से विनय करता है, उसके सभी शुभ कार्य हनुमान जी अवश्य सिद्ध करते हैं।
1.जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
हे संतों के हितकारी हनुमान जी, आपकी जय हो। हे प्रभु, हमारी प्रार्थना सुन लीजिए।
2.जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
सेवक के कार्य में विलंब न कीजिए, शीघ्र दौड़कर महान सुख दीजिए।
3.जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
जैसे आपने समुद्र लांघते समय सुरसा के विशाल मुख में प्रवेश करके भी पार पा लिया था।
4.आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
आगे जाकर लंकिनी ने रोका, तब आपने लात मारकर उसे स्वर्गलोक भेज दिया।
5.जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
विभीषण को सुख दिया और सीता माता के दर्शन कर परम पद प्राप्त किया।
6.बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अशोक वाटिका उजाड़ी, समुद्र में डुबोया, यमराज के दूतों को अति शीघ्र भगाया।
7.अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
अक्षय कुमार का वध किया और पूंछ में आग लगाकर लंका जलाई।
8.लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
लाख के समान पूरी लंका जल गई, स्वर्गलोक में जय-जयकार हुई।
9.अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी॥
हे स्वामी, अब किस कारण विलंब है, हे अंतर्यामी कृपा कीजिए।
10.जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर ह्वै दुःख करहु निपाता॥
लक्ष्मण जी के प्राणदाता, शीघ्र होकर हमारा दुख दूर कीजिए।
11.जै गिरिधर जै जै सुख सागर। सुर-समूह-समरथ भटनागर॥
हे गिरिधर, हे सुखसागर, देवताओं के समूह के समर्थ योद्धा।
12.ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ, हे हठीले हनुमंत, शत्रु को वज्र की कील से मारिए।
13.गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥
गदा और वज्र लेकर शत्रु को मारो, हे महाराज अपने दास को बचाओ।
14.ॐ कार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।
ॐकार की हुंकार से हे महाप्रभु दौड़िए, वज्र-गदा लेकर विलंब न कीजिए।
15.ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हे वानरराज हनुमंत, ॐ हुं हुं हुं शत्रु के हृदय और सिर पर प्रहार कीजिए।
16.सत्य होहु हरि शपथ पायके। राम दूत धरु मारु जाय के॥
श्री राम की शपथ लेकर सत्य सिद्ध होइए, राम दूत बनकर जाकर शत्रु को पकड़ मारिए।
17.जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥
हे अथाह शक्तिशाली हनुमंत, जय हो। किस अपराध से भक्त दुख पाता है।
18.पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥
मुझे पूजा, जप, तप, नियम-आचार कुछ नहीं आता, फिर भी मैं आपका दास हूँ।
19.वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥
वन, उपवन, मार्ग, पर्वत या घर - कहीं भी हो, आपके बल से हमें कोई भय नहीं।
20.पांय परौं कर जोरि मनावौं। येहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥
पैरों में पड़कर हाथ जोड़कर विनती करता हूँ, अब इस अवसर पर किसे पुकारूं।
21.जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता॥
हे अंजनी कुमार बलवान, शंकर सुत वीर हनुमंत, आपकी जय हो।
22.बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
आपका मुख भयंकर है, काल के कुल का नाश करने वाला है, आप सदा श्री राम की सहायता से भक्तों का पालन करते हैं।
23.भूत, प्रेत, पिशाच निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर॥
भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि, बेताल और काल तक को मार डालिए।
24.इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की। राखउ नाथ मरजाद नाम की॥
इन सबको मारिए, आपको राम की शपथ है, हे नाथ अपने नाम की मर्यादा रखिए।
25.जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ बिलंब न लावो॥
जानकी को हरि की दासी कहलाने की शपथ है, इसमें विलंब न कीजिए।
26.जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुःख नाशा॥
आकाश में जय-जयकार की ध्वनि होती है, स्मरण करते ही असहनीय दुख का नाश होता है।
27.चरण शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥
चरणों की शरण में हाथ जोड़कर मनाता हूँ, इस अवसर पर अब किसे पुकारूं।
28.उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पाँय परौं, कर जोरि मनाई॥
उठिए, उठिए, चलिए, आपको राम की दुहाई है, पैरों में पड़कर हाथ जोड़कर मनाता हूँ।
29.ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ चं चं चं चं चपल गति वाले, ॐ हनु हनु हनु हनु हे हनुमंत।
30.ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥
ॐ हं हं हांक देने वाले चंचल वानर, ॐ सं सं आपकी हांक से दुष्ट दल भयभीत होकर भाग जाता है।
31.अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनंद हमरो॥
अपने भक्त को तुरंत बचाइए, आपके स्मरण से हमें आनंद प्राप्त होता है।
32.यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिरि कौन उबारै॥
यह बजरंग बाण जिसे मारता है, उसे फिर कौन बचा सकता है।
शत्रु व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए
33.पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।
34.यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब कापैं॥
जो कोई यह बजरंग बाण जपता है, उससे सभी भूत-प्रेत कांपते हैं।
35.धूप देय जो जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥
जो नियमित धूप देकर इसका जाप करता है, उसके शरीर में कोई क्लेश नहीं रहता।
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
जो व्यक्ति प्रेम और प्रतीति से हनुमान जी को भजता है और सदा हृदय में उनका ध्यान धारण करता है, उसके सभी शुभ कार्य हनुमान जी अवश्य सिद्ध करते हैं।

हनुमान चालीसा श्री हनुमत स्तुति - पूरा पाठ

यह संस्कृत स्तुति हनुमान जी के गुणों का संक्षिप्त वर्णन करती है और अन्य पाठों से पहले या पश्चात बोली जाती है।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्। पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥

हनुमान चालीसा श्री हनुमत स्तुति - अर्थ सहित

1.मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
जो मन के समान वेगशाली हैं, पवन के समान तीव्र गति वाले हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को पूर्ण रूप से वश में कर लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, पवनपुत्र हैं, वानर सेना के प्रमुख हैं और श्री राम के दूत हैं — ऐसे हनुमान जी की मैं शरण में जाता हूँ।
2.आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्। पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥
मैं उन पवनपुत्र आंजनेय का ध्यान करता हूँ, जिनका मुख अत्यंत लाल आभा वाला है, जिनका शरीर स्वर्ण पर्वत के समान मनोहर है, और जो पारिजात वृक्ष के मूल में निवास करते हैं।
3.यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥
जहाँ-जहाँ श्री रघुनाथ (राम) का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ हाथ जोड़कर मस्तक झुकाए और हर्षाश्रुओं से भरे नेत्रों वाले हनुमान जी उपस्थित रहते हैं। ऐसे राक्षसों का नाश करने वाले मारुति को नमन करो।

हनुमान चालीसा श्री हनुमान आरती - पूरा पाठ

श्री हनुमान आरती "आरती कीजै हनुमान लला की" संकट के समय सुबह-शाम गाई जाती है, जो सभी रोग, कष्ट और भय को दूर करने वाली मानी जाती है।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जाके बल से गिरवर काँपे। रोग-दोष जाके निकट न झाँके॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥

दे वीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाये॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे। सियाराम जी के काज सँवारे॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे। लाये संजिवन प्राण उबारे॥

पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाईं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥

सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥

जो हनुमानजी की आरती गावे। बसहिं बैकुंठ परम पद पावे॥ लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई॥

हनुमान चालीसा श्री हनुमान आरती - अर्थ सहित

1.आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जाके बल से गिरवर काँपे। रोग-दोष जाके निकट न झाँके॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
हनुमान लला की आरती की जाती है, जो दुष्टों का नाश करने वाले श्री राम की शक्ति हैं। जिनके बल से पर्वत भी कांपते हैं, रोग-दोष उनके पास नहीं आते। अंजनी पुत्र महाबली सदा संतों के सहायक हैं।
2.दे वीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाये॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥
श्री रघुनाथ ने वीर हनुमान को भेजा, जिन्होंने लंका जलाकर सीता माता की खबर लाई। लंका जैसा किला और समुद्र जैसी खाई पार करने में पवनपुत्र को पल भर भी नहीं लगा।
3.लंका जारि असुर संहारे। सियाराम जी के काज सँवारे॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे। लाये संजिवन प्राण उबारे॥
लंका जलाकर राक्षसों का संहार किया और सीताराम जी के कार्य सफल किए। लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए, तब संजीवनी लाकर उनके प्राण बचाए।
4.पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाईं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥
पाताल में प्रवेश कर यमराज के कारागार तोड़े और अहिरावण की भुजा उखाड़ दी। बाईं भुजा से असुरों को मारा, दाहिनी भुजा से संतों का उद्धार किया।
5.सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥
देवता, मनुष्य और मुनि सब आपकी आरती उतारते हैं, जय-जयकार करते हैं। स्वर्ण थाल में कपूर की ज्योति जलाकर माता अंजना आरती करती हैं।
6.जो हनुमानजी की आरती गावे। बसहिं बैकुंठ परम पद पावे॥ लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई॥
जो कोई हनुमान जी की यह आरती गाता है, वह बैकुंठ में वास कर परम पद पाता है। लंका का विध्वंस करने वाले हनुमान जी की कीर्ति तुलसीदास जी गाते हैं।

हनुमान चालीसा पढ़ने के लाभ

  • भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है
  • मानसिक तनाव और चिंता में शांति मिलती है
  • आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है
  • कठिन कार्यों में सफलता मिलती है
  • शनि के दुष्प्रभाव व साढ़ेसाती के कष्ट में राहत मिलती है
  • रोग व शारीरिक कष्ट दूर होने में सहायता मिलती है

हनुमान चालीसा पाठ विधि और शुभ मुहूर्त

हनुमान चालीसा पाठ से पहले हनुमान जी और श्री राम की मूर्ति या चित्र स्थापित करें, सामने तांबे या पीतल के लोटे में जल भरकर रखें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, दीपक और धूप जलाएं। पाठ कम से कम 3 बार, विशेष इच्छा-पूर्ति हेतु 108 बार तक किया जा सकता है। पाठ के बाद रखा हुआ जल प्रसाद रूप में ग्रहण करें। पाठ से पहले मांस, मछली या मदिरा का सेवन न करें, और लाल आसन पर बैठकर ही पाठ करें।

मंगलवार और शनिवार का दिन हनुमान जी की पूजा और चालीसा पाठ के लिए विशेष शुभ माना जाता है। इसके अलावा सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी पाठ के लिए उत्तम है।

Frequently Asked Questions

मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा पढ़ना सबसे शुभ माना जाता है, हालांकि इसे प्रतिदिन सुबह या शाम को भी पढ़ा जा सकता है।

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