हनुमान चालीसा: संपूर्ण पाठ, हिंदी अर्थ और लाभ
हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित पढ़ें और सुनें। पाठ विधि, शुभ मुहूर्त और लाभ जानें। तुलसीदास रचित यह चालीसा संकट दूर करने में सहायक मानी जाती है।
Verified by Pt. Jitendra Vyas
श्री हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवधी भाषा में रचित 40 चौपाइयों का एक भक्ति ग्रंथ है, जो श्री हनुमान जी को समर्पित है। इसे नियमित पढ़ने से भय, नकारात्मकता और संकट दूर होते हैं तथा मन को शक्ति और शांति मिलती है। मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
हनुमान चालीसा पर पं. जितेन्द्र व्यास का अनुभव
हमारे परिवार में वैदिक कर्मकांड, ज्योतिष एवं श्रीहनुमान उपासना की परंपरा वर्ष 1955 से पूज्य पं. गोमती प्रसाद व्यास जी द्वारा प्रारंभ हुई। उसी गुरु-परंपरा का अनुसरण करते हुए मैं, पं. जितेन्द्र व्यास, वर्षों से श्रद्धालुओं को हनुमान चालीसा के सही उच्चारण और शास्त्रीय विधि का मार्गदर्शन दे रहा हूँ। मेरी दैनिक साधना में इसका स्थायी स्थान है — स्नान, दीप प्रज्वलन और पूर्ण एकाग्रता के साथ पाठ करता हूँ। मेरे अनुभव में पाठ की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण उसका भाव, शुद्ध उच्चारण और नियमितता है।
मेरे अनुभव से: कई श्रद्धालुओं ने नियमित हनुमान चालीसा पाठ अपनाने के बाद मानसिक तनाव में शांति, रुके हुए कार्यों में प्रगति और आत्मविश्वास में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किया है।
सबसे आम गलतियाँ: जल्दबाज़ी में पाठ करना, अशुद्ध उच्चारण, अर्थ समझे बिना केवल रटकर पढ़ना, और नियमितता की कमी।
"हनुमान चालीसा केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि आत्मबल, अनुशासन और भगवान श्रीहनुमान की कृपा प्राप्त करने का दिव्य माध्यम है।" — पं. जितेन्द्र व्यास
हनुमान चालीसा की उत्पत्ति
हनुमान चालीसा की रचना भक्तिकाल के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में की थी। मान्यता है कि हनुमान जी बाल्यावस्था में सूर्य को फल समझकर निगल गए थे, जिससे क्रोधित होकर इंद्र देव ने उन्हें मूर्छित कर दिया। बाद में जब देवताओं को पता चला कि हनुमान जी भगवान शिव के रुद्र अवतार हैं, तो सभी देवताओं ने उन्हें अपनी-अपनी शक्तियाँ प्रदान कर स्वस्थ किया। तुलसीदास जी ने इन्हीं शक्तियों और हनुमान जी के पराक्रम का वर्णन करते हुए इस चालीसा की रचना की।
हनुमान चालीसा - पूरा पाठ
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
शंकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन॥
विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हनुमान चालीसा दोहा - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा चौपाई - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा समापन दोहा - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा संकट मोचन हनुमानाष्टक - पूरा पाठ
संकट मोचन हनुमानाष्टक हनुमान जी के 8 प्रसंगों का वर्णन करने वाला स्तोत्र है, जो गंभीर संकट, न्यायालय के मामलों और ग्रह-दोष में विशेष लाभकारी माना जाता है।
बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अँधियारो। ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो। देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो। चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो। कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो। जीवत ना बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो। हेरी थके तट सिन्धु सबै तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसी सों कही सोक निवारो। ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो। चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बाण लग्यो उर लक्ष्मण के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो। लै गृह वैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सु-बीर उपारो। आनि संजीवनी हाथ दई तब, लक्ष्मण के तुम प्राण उबारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
रावण युद्ध अजान कियो तब, नाग की फांस सबै सिर डारो। श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो। आनि खगेस तबै हनुमान जु, बन्धन काटि सुत्रास निवारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
बन्धु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो। देवहिं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र विचारो। जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समैत संहारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
काज किये बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि विचारो। कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो। बेगि हरौ हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो। को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
लाल देह लाली लसे, अरू धरि लाल लँगूर। बज्र देह दानव दलन, जय जय कपि सूर॥
हनुमान चालीसा संकट मोचन हनुमानाष्टक - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा श्री बजरंग बाण - पूरा पाठ
बजरंग बाण अत्यंत प्रभावशाली पाठ है, जो गंभीर संकट, भय, रोग और शत्रु बाधा में तुरंत राहत के लिए पढ़ा जाता है। इसे विशेष श्रद्धा और सावधानी के साथ पढ़ना चाहिए।
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अन्तर्यामी॥
जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर ह्वै दुःख करहु निपाता॥
जै गिरिधर जै जै सुख सागर। सुर-समूह-समरथ भटनागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥
ॐ कार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥
सत्य होहु हरि शपथ पायके। राम दूत धरु मारु जाय के॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत हौं दास तुम्हारा॥
वन उपवन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं॥
पांय परौं कर जोरि मनावौं। येहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन वीर हनुमंता॥
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिशाच निशाचर। अग्नि बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की। राखउ नाथ मरजाद नाम की॥
जनकसुता हरि दास कहावो। ताकी शपथ बिलंब न लावो॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुःख नाशा॥
चरण शरण कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पाँय परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनंद हमरो॥
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिरि कौन उबारै॥
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापै। ताते भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
हनुमान चालीसा श्री बजरंग बाण - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा श्री हनुमत स्तुति - पूरा पाठ
यह संस्कृत स्तुति हनुमान जी के गुणों का संक्षिप्त वर्णन करती है और अन्य पाठों से पहले या पश्चात बोली जाती है।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्। पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥
हनुमान चालीसा श्री हनुमत स्तुति - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा श्री हनुमान आरती - पूरा पाठ
श्री हनुमान आरती "आरती कीजै हनुमान लला की" संकट के समय सुबह-शाम गाई जाती है, जो सभी रोग, कष्ट और भय को दूर करने वाली मानी जाती है।
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जाके बल से गिरवर काँपे। रोग-दोष जाके निकट न झाँके॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे वीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाये॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे। सियाराम जी के काज सँवारे॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे। लाये संजिवन प्राण उबारे॥
पैठि पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाईं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥
सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥
जो हनुमानजी की आरती गावे। बसहिं बैकुंठ परम पद पावे॥ लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई॥
हनुमान चालीसा श्री हनुमान आरती - अर्थ सहित
हनुमान चालीसा पढ़ने के लाभ
- भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है
- मानसिक तनाव और चिंता में शांति मिलती है
- आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है
- कठिन कार्यों में सफलता मिलती है
- शनि के दुष्प्रभाव व साढ़ेसाती के कष्ट में राहत मिलती है
- रोग व शारीरिक कष्ट दूर होने में सहायता मिलती है
हनुमान चालीसा पाठ विधि और शुभ मुहूर्त
हनुमान चालीसा पाठ से पहले हनुमान जी और श्री राम की मूर्ति या चित्र स्थापित करें, सामने तांबे या पीतल के लोटे में जल भरकर रखें। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, दीपक और धूप जलाएं। पाठ कम से कम 3 बार, विशेष इच्छा-पूर्ति हेतु 108 बार तक किया जा सकता है। पाठ के बाद रखा हुआ जल प्रसाद रूप में ग्रहण करें। पाठ से पहले मांस, मछली या मदिरा का सेवन न करें, और लाल आसन पर बैठकर ही पाठ करें।
मंगलवार और शनिवार का दिन हनुमान जी की पूजा और चालीसा पाठ के लिए विशेष शुभ माना जाता है। इसके अलावा सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी पाठ के लिए उत्तम है।
यह भी पढ़ें
मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा पढ़ना सबसे शुभ माना जाता है, हालांकि इसे प्रतिदिन सुबह या शाम को भी पढ़ा जा सकता है।
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